12 ज्योतिर्लिंगों का यही पारंपरिक क्रम क्यों है?
तो इसका कारण मुख्यतः द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र है। इसमें भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम एक निश्चित क्रम में आता है।
स्तोत्र की शुरुआत होती है:
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालम् ॐकारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
इसीलिए पारंपरिक सूची में क्रम इस प्रकार मिलता है:
1. सोमनाथ → 2. मल्लिकार्जुन → 3. महाकालेश्वर → 4. ओंकारेश्वर → 5. वैद्यनाथ → 6. भीमाशंकर → 7. रामेश्वर → 8. नागेश्वर → 9. काशी विश्वनाथ → 10. त्र्यंबकेश्वर → 11. केदारनाथ → 12. घृष्णेश्वर
स्तोत्र में जिस क्रम से नाम आए हैं, उसे पारंपरिक/शास्त्रीय नाम-क्रम कहा जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि भक्त को 1 से 12 तक उसी क्रम में यात्रा करनी चाहिए।
इस स्तोत्र में सोमनाथ पहले और घृष्णेश्वर आखिरी क्यों है
शिवपुराण या किसी एक प्रामाणिक शास्त्र में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि “सोमनाथ को इसलिए प्रथम और घृष्णेश्वर को इसलिए अंतिम रखा गया।” इसलिए इस क्रम के बारे में जो बातें कही जाती हैं, उनमें कुछ शास्त्रीय आधार हैं और कुछ परंपरागत व्याख्याएँ।
1. सोमनाथ प्रथम क्यों?
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र की शुरुआत ही होती है:
“सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्…”
अर्थात सबसे पहले सौराष्ट्र के सोमनाथ का स्मरण आता है।
सोमनाथ की पौराणिक कथा में चंद्रदेव (सोम) का विशेष संबंध है। दक्ष प्रजापति की पुत्रियों से विवाह करने के बाद चंद्रमा ने रोहिणी को अधिक महत्व दिया। दक्ष के शाप से चंद्रमा की ज्योति क्षीण होने लगी। तब उन्होंने भगवान शिव की आराधना की। शिव ने उन्हें शाप से मुक्ति दी और यहीं सोमनाथ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
इसलिए “सोम” अर्थात चंद्रमा से जुड़े शिव को प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में स्मरण करने की परंपरा बनी मानी जाती है।
एक और धार्मिक दृष्टि से देखा जाता है—चंद्रमा मन का प्रतीक माना जाता है, इसलिए यात्रा की शुरुआत सोमनाथ से करना मन को शिव में लगाने का प्रतीकात्मक अर्थ भी लिया जाता है।
2. फिर घृष्णेश्वर आखिरी क्यों?
स्तोत्र की अंतिम पंक्ति है:
“हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥”
यहाँ घुश्मेश/घृष्णेश्वर का उल्लेख सबसे अंत में आता है।
घृष्णेश्वर की प्रसिद्ध कथा घुश्मा नाम की शिवभक्त महिला से जुड़ी है। वह प्रतिदिन शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करती थीं और बड़ी श्रद्धा से उन्हें विसर्जित करती थीं। कठिन पारिवारिक परिस्थिति और अपने पुत्र की मृत्यु जैसी परीक्षा के बाद भी उनकी शिवभक्ति नहीं टूटी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वहीं घुश्मेश्वर/घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करने का वर दिया।
इसलिए घृष्णेश्वर का अंतिम स्थान भक्ति की पराकाष्ठा और पूर्ण समर्पण से जोड़कर देखा जाता है।
3. क्या 1 से 12 तक कोई आध्यात्मिक यात्रा भी छिपी है?
यह एक सुंदर पारंपरिक व्याख्या है, लेकिन इसे शास्त्र द्वारा निर्धारित तथ्य नहीं कहना चाहिए।
कुछ भक्त इस क्रम को एक आध्यात्मिक यात्रा की तरह देखते हैं:
सोमनाथ → मल्लिकार्जुन → महाकाल → ओंकारेश्वर → वैद्यनाथ → भीमाशंकर → रामेश्वर → नागेश्वर → विश्वनाथ → त्र्यंबकेश्वर → केदारनाथ → घृष्णेश्वर
अर्थात शुरुआत शिव के दर्शन की इच्छा से होती है और अंत पूर्ण समर्पण/भक्ति पर।
लेकिन यह ध्यान रखें कि यह प्रतीकात्मक व्याख्या है, मूल स्तोत्र में इस तरह की व्याख्या नहीं दी गई है।
एक बहुत रोचक बात — “पहला” और “आखिरी” का अर्थ
सोमनाथ पहला होने का अर्थ यह नहीं कि वह बाकी 11 से “बड़ा” या अधिक शक्तिशाली है।
इसी प्रकार घृष्णेश्वर अंतिम होने का अर्थ यह नहीं कि उसका महत्व कम है।
सभी 12 को भगवान शिव के ज्योति स्वरूप के समान ही पवित्र माना जाता है।
इसे ऐसे समझ सकते हैं:
क्रम अलग है, महत्त्व समान है।
और वास्तव में ज्योतिर्लिंगों की यात्रा के लिए 1→12 क्रम में जाना धार्मिक रूप से अनिवार्य नहीं है।
